• in

    Copper Mugs में Cocktail पीना सेहत के लिए है हानिकारक, तो अगली बार Bar में ज़रा ध्यान से!

    2017 में पीने वालों के लिए एक नए तरह का ट्रेंड चल पड़ा है. बहुत से Bar Copper Mugs में Cocktails सर्व करने लगे हैं.

    Copper Mugs में सबसे ज़्यादा Moscow Mule सर्व किया जा रहा है. देखने में बेहद ख़ूबसूरत इन Mugs में Alcohol या Cocktail पीने से आपको Food Poisoning हो सकती है और यही नहीं, आपकी जान भी जा सकती है. तांबे के लोटे का पानी पीना फायदेमंद होता है, पर उसमें दारू पीना जानलेवा है.

    The Food and Drug Administration के अनुसार, जिन खाने-पीने की चीज़ों का pH Level 6 से कम है, उन्हें तांबे के बर्तनों में कभी नहीं खाना चाहिए. Moscow Mule जैसे अन्य कई Cocktails का pH लेवल 6 से कम होता है. इस कारण US के कई राज्यों ने Copper Mugs से होने वाले नुकसान से जनता को आगाह करना शुरू कर दिया है.

    अगर आप Copper Mugs में अपने Cocktails का लुत्फ़ उठाना ही चाहते हैं, तो ऐसे Mugs में ड्रिंक करें, जिन पर Nickel या स्टील की Coating हो. इससे Food Poisoning का ख़तरा नहीं रहेगा और क्लासी तांबे के Mugs में आप ड्रिंक्स का मज़ा ले सकते हैं.

    Source: Scoop Whoop

  • in

    भारत-नेपाल का सांझा गांव धारचूला: इसकी ज़मीन भारत की, आसमां नेपाल का, हवा भारत की, पानी नेपाल का

    आये, ठहरे और रवाना हो गये,                                                                                                                 ज़िन्दगी क्या है, सफ़र की बात है.

    हैदर अली ज़ाफ़री ने भी क्या ख़ूब कहा है ना? सफ़र तो आप भी रोज़ करते हैं. रोज़ाना न जाने आप कितना सफ़र करते हैं. घर से ऑफ़िस, ऑफ़िस से सब्ज़ी मंडी, सब्ज़ी मंडी से वापस घर, पर क्या वो सफ़र है? मेरी समझ से तो नहीं. न कहीं ठहरते हैं, न रुककर सोचते हैं. पता नहीं किस बात की जल्दी रहती है कि पास में खड़े इंसान अगर परेशान हो या रो भी रहा हो तो आपको दिखाई नहीं देता.

    ज़िन्दगी है तो जिये जा रहे हैं, लीक से हटकर काम करने वाले बहुत कम ही लोग हैं इस दुनिया में. यहां तक की घूमने-फिरने के लिए भी एक ढर्रे पर ही लोग कुछ ख़ासम-ख़ास जगहों पर ही जाते हैं. जिसका नतीजा ये होता है कि उन स्थानों पर भीड़ के कारण उतने मज़े नहीं आते. अगर आप फ़ोटो खिंचने के लिए ही यात्रा करते हैं तो आपको ज़्यादा परेशानी नहीं होगी.

    Source: WordPress

    मशीनी ज़िन्दगी में कुछ लम्हें ख़ुद के लिये निकालना तो कोई गुनाह नहीं है. चंद लम्हें यानी कि मामा-चाचा के घर चाय-बिस्कुट पर जाना बिल्कुल नहीं है. 1 हफ़्ते की छुट्टी लेकर शिमला, कुल्लू-मनाली तो बहुत से लोग जाते हैं, पर अगर सुकून चाहिये तो किसी भीड़-भाड़ वाली जगह पर जाने का कोई मतलब नहीं है.

    क्यों न किसी ऐसी प्राकृतिक जगह पर जाया जाये, जहां इंसानों की चहल-कदमी कम हो और घूमने का मज़ा भी दोगुना मिले?

    धारचूला, उत्तराखंड के पिथौरागढ़ ज़िले में बसा एक बेहद ख़ूबसूरत शहर है. बड़े शहर के रहनेवाले इसे कभी शहर नहीं कहेंगे, क्योंकि न तो यहां बड़े-बड़े शॉपिंग सेंटर है और न ही शहर जैसी सुविधायें. हिमालय की गोद में बसा है धारचूला. स्थानीय निवासियों के अनुसार, किसी ज़माने में इस शहर से कई ट्रेड रूट्स गुज़रते थे. हिमालय की ऊंची-ऊंची पहाड़ियों से घिरा ये एक ख़ूबसूरत सा कस्बा है.

    Source: E-Uttaranchal

    धारचूला के निवासी, पहाड़ों के उस पार बसे नेपाल के दारचूला के निवासीयों से काफ़ी मिलते-जुलते हैं. ये जगह पर्यटकों के बीच उतनी लोकप्रिय नहीं है, इसीलिये यहां भीड़ नहीं दिखती.

    समुद्रतल से 915 मीटर की ऊंचाई पर बसा ये कस्बा ख़ुद में प्रकृति के कई ख़ज़ाने समेटे हुये है.धारचूला दो शब्दों से मिलकर बना है. धार यानि कि पहाड़ी और चूला यानि चूल्हा. ये घाटी चूल्हे जैसी दिखती है, इसीलिये इसका नाम धारचूला है.

    धारचूला में है बहुत कुछ-

    1) जौलजिबी

    Source: I Love Uttarakhand

    ये गौरी और काली नदी का संगम स्थल है. हर साल नवंबर में यहां मेला लगता है. नेपाल और अन्य देशों से इस मेले में लोग शामिल होने के लिए आते हैं.

    2) काली नदी

    Source: Holiday IQ

    इस नदी को महाकाली या शारदा नदी के नाम से भी जाना जाता है. ये नदी नेपाल और भारत का बॉर्डर भी है. तो देर किस बात की है, आप भी यहां जाएं और नदी में अपने सारे टेंशन डाल दें. यहां जाकर आप अपनी सारी चिंताएं भूल जाएंगे.

    3) चिरकिला डैम

    Source: India Tourism For you

    धारचूला से 20 किमी की ही दूरी पर है ये डैम. ये डैम काली नदी पर ही बनाया गया है. प्राकृतिक सुंदरता के अलावा कुछ ही दिनों में यहां वॉटर स्पोर्ट्स की सुविधा भी शुरू हो जाएगी.

    4) ओम पर्वत

    Source: Pintrest

    ओम पर्वत को आदि कैलाश, बाबा कैलाश, छोटा कैलाश आदि नामों से भी जाना जाता है. इस पर्वत पर बर्फ़ से ओम की आकृति बनी हुई है. ओम पर्वत के पास में ही पार्वती झील और जोन्गलिन्गकोन्ग झील. ये तिब्बत के कैलाश पर्वत से मिलता-जुलता है.

    5) Askot Musk Deer Sanctuary

    Source: The WWW Site

    प्रकृति प्रेमियों के लिए ये जगह स्वर्ग है. 5412 मीटर की ऊंचाई पर स्थित इस सेन्चुअरी में विवध तरह के पशू-पक्षी और फूल-पौधे पाये जाते हैं. धारचूला जाकर यहां जाना न भूलें.

    6) नारायण आश्रम

    Source: E Samskriti

    समुद्र तल से 2734 मीटर की ऊंचाई पर बना है ये आश्रम. इसे नारायण स्वामी ने बनवाया था. आस्था न भी हो, पर यहां की प्राकृतिक सुंदरता का लुत्फ़ उठाने के लिये ज़रूर जाएं.

    कब जाएं?

    वैसे तो कभी भी, पर बेस्ट टाइम है, मार्च से जून या सितंबर से दिसंबर के बीच. मौसम हमेशा सुहाना रहता है, गर्मियों में न तो ज़्यादा गर्मी पड़ती है और सर्दियों में बर्फ़बारी भी होती है.

    कैसे पहुंचे?

    Airways: नज़दीकी हवाईअड्डा पंतनगर है. पंतनगर से धारचूला टैक्सी से पहुंच सकते हैं.

    Via Rail: टनकपुर नज़दीकी रेलवे स्टेशन है. पिथौरागढ़ से 150 किमी की दूरी पर है. स्टेशन से धारचूला के लिये बसें मिल जाएंगी.

    Via Road: रेल मार्ग से अच्छे से लिंक न होने के बावजूद धारचूला तक सड़कें जाती हैं. तो 4 Wheeler बुक कीजिए और निकल पड़िए धारचूला.

    यूं तो इंसानों ने हर जगह सरहदें बना दी हैं, पर धारचूला में आपको नेपाल के साथ दोस्ताना रिश्तों की अनोखी झलक दिखेगी. हमारी मानिये और इस बार धारचूला का प्रोग्राम बना लीजिए.

    Feature Image Source: Blogspot

  • in

    सूट ऐसा होना चाहिए कि ऑफ़िस में Impression भी जमा सके और स्विमिंग भी करवा सके, जैसे ये Swimsuit

    अगर आप अपने सूट से बेहद प्यार करते हैं और उसे ज़्यादातर समय पहनना पसंद करते हैं, तो आपके लिए एक अच्छी ख़बर है. ये वेटसूट आपको अपने फ़ेवरेट सूट की फ़ील भी देगा, साथ ही आप इस सूट में आसानी से तैर भी सकते हैं.

    अगर पानी बेहद ठंडा है और आपको ज़्यादा समय तक और ज़्यादा दूरी तक नहीं तैरना है, तो आप इन Wet Suits का इस्तेमाल कर सकते हैं. हालांकि इन्हें पहनने से आपके पानी में बैलेंस पर प्रभाव पड़ सकता है.

    अगर आप ओपन वॉटर में स्वीमिंग करना चाहते हैं और पानी बेहद ठंडा है तो आप ड्राई सूट का भी इस्तेमाल कर सकते हैं. ये सूट न केवल आपके शरीर को गर्म रखते हैं बल्कि गंदे पानी में भी आपके शरीर को गंदगी से बचाते हैं.

    Wetsuits का आमतौर पर इस्तेमाल वॉटर डाइवर्स, सर्फ़र्स और पानी से जुड़े खेलों के विशेषज्ञ करते हैं.

    1952 में ह्यूज़ ब्रैडफ़ोर्ड ने यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफॉर्निया में पहली बार मॉर्डन Wetsuit का निर्माण किया था.

    Wetsuits जहां पानी को आपके शरीर में आने देता है, वहीं Dry Suits को कुछ इस तरह से डिज़ाइन किया जाता है, जिससे पानी आपके शरीर के अंदर न घुस पाए. Wetsuits की तुलना में Drysuits ज़्यादा महंगे होते हैं और पहनने में भी ज़्यादा जटिल होते हैं, लेकिन जब भी आपको गंदे पानी में उतरना हो या पानी का तापमान बेहद कम हो, ऐसे मामलों में ड्राईसूट्स का इस्तेमाल किया जा सकता है.

    सोच क्या रहे हो, एक तो ले ही लिया जाए.

    Source: Acidcow

  • in

    Acupressure से लेकर पूरे शरीर और दिमाग़ को Relax करते हैं खड़ाऊ, पहले के लोग इन्हें यूं ही नहीं पहनते थे

    हमारे देश ने दुनिया को बहुत सारी ऐसी चीज़ें दी हैं, जिनके बिना संसार का काम-काज नहीं चल सकता. चाहे वो शून्य हो या सर्जरी. गौरतलब है कि हम अपनी संस्कृति को भूलते जा रहे हैं और विदेशी हमारी संस्कृति को ही अपना रहे हैं.

    चाहे वो पहनावा हो या खान-पान, हमने Globalization के बहाने से ही सही, पर विदेशी संस्कृति को पूरी तरह से अपनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. भारतीय परिधान हम कुछ खास मौकों पर ही पहनते हैं, Ethnic Wear हम रोज़ नहीं पहन सकते.

    Source: Pick click

    Office के लिए अलग लुक, Saturday पार्टी के लिए अलग लुक, सब Fixed है. चाहे कितने भी Uncomfortable क्यों ना हो, पर इन Fashion Rules का पालन करना बहुत से लोगों के लिए आन बान शान की बात हो जाती है. अब Stilettos या High Heels को ही ले लीजिये, आराम से Carry करने वाले भी इस बात से इंकार नहीं कर सकते की ये न सिर्फ़ Uncomfortable हैं, बल्कि सेहत के लिए नुकसानदायक हैं.

    एक ज़माना था जब लकड़ी या पेड़ों की छाल या घास से Footwear बनाए जाते थे. लकड़ी हमेशा से Fashion में है.

    Source: Flipkart

    भारत में पादुका या खड़ाऊ का चलन बहुत पहले से है. रामायण में भी खड़ाऊ का वर्णन मिलता है, राम के खड़ाऊ को सिर पर रखकर भरत अयोध्या वापस आए थे और राजसिंहासन पर राम के खड़ाऊ को ही स्थापित किया था. भारत के Geographical Structure को देखकर यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि यहां की धरती पर चलना आसान नहीं. लकड़ी के खड़ाऊ न सिर्फ़ चलने में सहायक होते थे, बल्कि ये काफ़ी Comfortable भी थे.

    Source: Indiamart

    खड़ाऊ लकड़ी के बने Footwear हैं. भारतवर्ष में विभिन्न प्रकार के खड़ाऊ बनाए जाते थे. कहीं पर इन्हें पांव के आकार का बनाया जाता था तो कहीं पर मछली के आकार का. कहीं-कहीं तो हाथी दांत या चांदी के भी खड़ाऊ बनाए जाते थे.

    Source: Pintrest

    किसी ज़माने में हर भारतीय के पांव में दिखने वाली खड़ाऊ या पादुका को आज सिर्फ़ बाबा या साधु ही पहनते हैं.

    खड़ाऊ आजकल Fashion का हिस्सा नहीं हैं और ये साधु-संतों के ही जीवन का हिस्सा बनकर रह गए हैं. लेकिन खड़ाऊ पहनने से स्वास्थ्य को बहुत सारे फायदे होते हैं-

    1. खड़ाऊ पहनने से आपकी रीढ़ की हड्डी सीधी रहती है और आपका Posture भी Balanced रहता है.

    2. खड़ाऊ पैर के कुछ Acupressure Points पर प्रेशर बनाते हैं, जिससे शरीर में सुचारू रूप से रक्त का संचार होता है.

    3. खड़ाऊ बनाने में किसी भी जानवर की हत्या नहीं की जाती.

    4. खड़ाऊ पहनने से पांव को सर्दी भी नहीं लगती और उबड़-खाबड़ रास्तों पर चलना भी आसान हो जाता है.

    Source: Wikipedia 

    5. खड़ाऊ भारतीय सभ्यता का हिस्सा हैं, इसे पहनने में शर्म महसूस नहीं होनी चाहिए.

    6. खड़ाऊ पहनने से आपके पैरों की माशपेशियों को आराम मिलता है, जिससे आपका शरीर और दिमाग, दोनों तनावमुक्त होते हैं.

    7. खड़ाऊ सस्ते, सुंदर, टिकाऊ होते हैं और इन्हें बनाने में भी अधिक लागत नहीं आती.

    जब पादुका के इतने फायदे हैं तो इन्हें अपने Lifestyle का हिस्सा बनाने में भी किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए.  

  • in

    सिर्फ़ चिड़ियां ही नहीं, आदमी भी पुल के नीचे घर बना सकते हैं. ‘Fernando Abellanas’ ने ये साबित कर दिया है

    बचपन में तो सब ही बिस्तर के नीचे, टेबल के नीचे, अलमारियों से चादर बांध कर घर-घर खेलते होंगे. लेकिन बड़े होने पर भइये शौक कायम रहे, ये मुश्किल है. लेकिन इसे आगे बढ़ाया है Fernando Abellanas नाम के प्लम्बर एवं फर्नीचर डिज़ाइनर ने. Valencia, Spain, में Fernando Abellanas ने ये कमाल कर दिखाया है अपनी कारीगरी से. रहने और काम करने के लिए जिन चीज़ों की ज़रूरत हो, वो सभी यहां मौजूद हैं! टेबल, कुर्सी, अलमारी, आदि. लेकिन इस पुल की जगह यानि, पता उन्होंने अभी तक सबसे छुपा कर रखा है! कहीं मेहमान न आ जाएं! या वहां की ऑथॉरिटीज़ उस पर ताला न लगा दे, ज़ब्त न कर लें.

    अब आप ही बताइये, इसमें रहने का मन किसका न होगा! हम तो यही चाहेंगे, कि ये जगह सबसे छुपी रहे.

    Source: instagram facebook demilked

  • in

    जेब में थे बस 3800 रुपये, पर दुनिया घूमने का जज़्बा लिए इस शख़्स ने 4 सालों में कर डाली 45 देशों की यात्रा

    दुनिया घूमने का सपना कई लोगों का होता है लेकिन कम ही ऐसे लोग होते हैं जो अपने इस सपने को साकार कर पाते हैं. लेकिन जर्मनी के एक नौजवान ने विपरीत परिस्थितियां होते हुए भी ये कारनामा कर दिखाया है. 45 देश और 1511 दिनों की उनकी इस हैरतअंगेज़ यात्रा में कई उतार-चढ़ाव आए लेकिन जेब में केवल 46 पाउंड के साथ उन्होंने ऐसा कर दिखाया.

    क्रिस्टोफ़र स्कॉट 23 साल के हैं और वे रविवार को अपने देश जर्मनी वापस लौट रहे हैं. Schleswig-Holstein के एक छोटे से गांव Sahms में रहने वाले क्रिस चार सालों की यात्रा के बाद घर लौटने को लेकर बेहद उत्साहित हैं. क्रिस्टोफ़र ने अपने सफ़र की शुरूआत 1 जुलाई 2013 को की थी. उनकी जेब में महज़ 50 पाउंड थे और वे लिफ़्ट लेकर एम्सटर्डम पहुंच गए थे.

    उस समय शायद क्रिस को भी एहसास नहीं होगा कि उनका ये सफ़र 62000 मील तक चलेगा. क्रिस ने प्रशांत महासागर और अटलांटिक महासागर को भी बोट से ही पार किया था. क्रिस ने अपनी ट्रिप के दौरान कई ऐसे काम किए जिन्हें सामान्य ज़िंदगी में वो शायद कभी ट्राई नहीं करते. वे इस दौरान उन्होंने एक Yacht पर हाथ बंटाया और ड्रग तस्करों के बीच भी काम किया. उन्होंने इस दौरान हवाई जहाज़ को छोड़कर हर तरह के ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल किया.

    अपनी इस ट्रिप के दौरान वे कई रोमांचक दौर से भी गुज़रे थे. Vanuatu नाम के देश में वे उफ़नते ज्वालामुखी के काफ़ी करीब पहुंच गए थे. उन्होंने कहा कि एक बार बेहद अंधेरी रात में हम एक ज्वालामुखी की तरफ़ बढ़ रहे थे और जैसे ही हम ज़्वालामुखी के टॉप पर पहुंचे एक भयंकर लहर हमारी तरफ़ आती दिखाई दी. उन्होंने कहा कि उस दौरान ऐसा लगा मानो पूरी धरती हिल गई हो. हमारा एक साथी तो लावा से महज कुछ ही कदमों की दूरी पर था. हालांकि हम बच निकलने में कामयाब रहे. ये जितना डरावना था उतना ही रोमांचक भी था.

    पिछले चार सालों में, मैंने खुले आसमां के नीचे सैंकड़ों बार रात बिताई है. कई बार मैं सड़कों पर सोया, तो कभी पोर्ट्स पर, कई बार मुझे शहर के बदहाल क्षेत्रों में भी रात बितानी पड़ी. उन्होंने कहा कि ‘मैं ड्रग तस्करों के साथ रह रहा था, इनमें से कुछ लोग अपराधी भी थे और मैंने लगभग हर देश में Hitchhiking भी की थी, इसे किस्मत कहें या कुछ और लेकिन पिछले चार सालों में मेरे साथ लूट की कोई घटना नहीं हुई.’

    क्रिस ने कहा कि ‘जैसे ही मैं ब्रिटिश गुयाना पहुंचा. मैंने दो लड़कियों को अपना दोस्त बना लिया. इन लड़कियों ने मुझे अपने साथ रहने का ऑफ़र दिया लेकिन उन्होंने पहले ही साफ़ कर दिया था कि वे एक Ghetto के बीचों-बीच रहती हैं. मैंने उनका ऑफ़र स्वीकार कर लिया.’

    क्रिस का कहना था कि ये महिला दरअसल कोई और नहीं बल्कि ब्रिटिश गुयाना के सबसे बड़े ड्रग तस्कर की छोटी बहन थी. क्रिस ने अपनी यात्रा के दौरान 20 अलग-अलग तरह के प्रोफ़ेशन में हाथ आज़माया. गुयाना में गोल्ड माइनिंग में जॉब करने के अलावा उन्होंने पेरू में एक पेट्रोल पंप कर्मचारी के तौर पर भी काम किया वहीं दक्षिण कोरिया में सैमसंग के एक विज्ञापन के लिए उन्होंने बतौर एक्टर काम करने का भी मौका मिला.

    उन्होंने कहा कि यूं तो ट्रांसपोर्ट, रहने और खाने का इंतज़ाम ही किसी ट्रिप के दौरान महंगा पड़ता है. लेकिन मैंने इस मामले में काफ़ी पैसा बचाया. मैं खुशकिस्मत था कि इस दौरान मुझे कई शानदार लोग भी मिले वर्ना इतने कम पैसों में दुनिया घूम लेना आसान नहीं होता.

    क्रिस का कहना था कि ये महत्वपूर्ण नहीं है कि आप कितना कमाते हैं लेकिन ये बेशक ज़रूरी है कि आप किस तरह से अपना पैसा खर्च करते हैं. अगर इंसान की फितरत खर्चीली न हो तो पेरिस जैसी जगहों पर भी 2 पाउंड से भी कम में रहा जा सकता है.

    क्रिस की इस शानदार यात्रा को लेकर जर्मन मीडिया में भी खबरें आई थी. इन्हीं खबरों को पढ़ मिचेल नाम की एक महिला ने क्रिस को पत्र लिखना शुरू किया था. क्रिस जब भारत आने का प्लान कर रहे थे तो मिचेल ने भी क्रिस के साथ आने का फ़ैसला किया और अब ये दोनों कपल हैं.

    अपने घर, जर्मनी लौटने के बाद क्रिस अपनी थियोलॉजी की पढ़ाई पूरी करना चाहते हैं., अपनी गर्लफ़्रे़ड के साथ वक्त बिताना चाहते हैं और अपने यात्रा के अनुभवों को एक किताब की शक्ल देना चाहते हैं. क्रिस को हालांकि सबसे ज़्यादा इंतज़ार अपनी फ़ेवरेट जर्मन ब्रेड और बीयर का है.

    Source: The Sun

  • in

    अगर सोचते हो कि ग्राहक सिर्फ़ बेवक़ूफ़ बनते हैं, तो Consumer Court के इन Cases के बारे में ज़रूर पढ़िए

    ‘जागो ग्राहक जागो’ वाले कई Ad आपने देखे होंगे, पर ऐसे बहुत ही कम ग्राहक हैं जो ‘जागते’ हैं. ख़ैर ग्राहकों को ठगने में हमारे देश में कई लोगों ने महारत हासिल की हुई है. हम लगभग हर रोज़ बेवकूफ़ बनते हैं. कई बार जानबूझकर अनदेखा कर देते हैं, तो कई बार हमें पता नहीं चलता कि हमें उल्लू बनाया जा रहा है.

    लेकिन सभी लोग आंख और कान बंद करके ख़रीदारी नहीं करते. इसका सुबूत है उपभोक्ता न्यायालय में दर्ज हज़ारों केस. उनमें से कुछ Extra Interesting मामलों की हमने लिस्ट बनाई है.

    पढ़िए और जाग जाइए

    1. छात्र ने Crayon Company पर रंगभेदी Crayon बनाने के लिए ठोका मुकदमा.

    Source: Hilobro

    NLSIU के चिरायु जैन ने एक Crayon Company पर 1 लाख का मुकदमा ठोका. चिरायु को कंपनी के Skin Colour Crayon से आपत्ति थी. इंटरनेट पर गहन खोज करने पर भी ये पता नहीं चला कि इस केस का क्या फ़ैसला आया था. ये 2013 का केस है.

    2. बाल उगाने वाले तेल को लगाकर झड़ने लगे बाल.

    Source: Hair Building Fibre Oil

    2015 में चंडीगढ़ के शिव चरनजीत ने टीवी पर ऐड देखकर Hair Building Fiber Oil मंगवाया. लेकिन तेल लगाने के बाद चरनजीत के बाल उगने के बजाये और ज़्यादा झड़ने लगे. तब उन्होंने कंपनी के खिलाफ़ कंज़्यूमर कोर्ट में मुकदमा दायर किया. कोर्ट ने कंपनी को 25,000 रुपये मुआवज़े के रूप में देने का फ़ैसला सुनाया.

    3. फ़र्ज़ी Merchant Navy Academy पर केस.

    Source: Baddiuniv

    मोहाली की अरविंद कौर ने अपने बेटे मोहित का एडमिशन विवेकानंद यूनिवर्सिटी ऑफ़ मर्चेन्ट अकेडमी में करवाया था. पूरी फ़ीस वसूलने के बावजूद Academy ने वैसी ट्रेनिंग नहीं दी जैसा उसने दावा किया था. अरविंद ने केस किया और मुआवज़े के रूप में उन्हें पूरी फ़ीस और अतिरिक्त 60,000 रुपये मिले.

    4. बुक में Grammatical Error के लिए घसीटा कोर्ट.

    Source: Haiku deck

    2010 में लेखिका शोभा प्रकाश जोशी ने अपने एडिटर के खिलाफ़ कन्ज़्यूमर कोर्ट में मुक़दमा दायर किया था क्योंकि उनकी किताब में Grammatical Error थे. शोभा ने पब्लिशर्स के खिलाफ़ ये केस जीत लिया था.

    5. गलत दांत उखाड़ने पर डॉक्टर को घसीटा कोर्ट.

    Source: Men’s Health

    2010 में ये अनोखा केस कन्ज़्यूमर कोर्ट के पास आया. पूनम देवी ने डॉक्टर कोहली के खिलाफ़ केस किया था. दांत दर्द की शिकायत लेकर पूनम डॉक्टर के पास पहुंची थी, लेकिन डॉक्टर ने उनके 1 नहीं, दो दांत उखाड़ दिए. इसके बाद भी उनको दर्द से राहत नहीं मिली. तंग आकर पूनम ने कन्ज़्यूमर कोर्ट में केस किया. अदालत ने उन्हें मुआवज़े के तौर पर 50 हज़ार रुपये दिलवाए.

    6. बच्ची ने गिनी माचिस की तिलियां, किसी भी डिब्बे में नहीं थी 50 तिलियां. बच्ची के पापा ने किया कोर्ट में केस

    Source: Indiamart

    इस केस कौन से साल का है, ये बहुत ढूंढने पर भी इंटरनेट पर नहीं मिल पाया. पर ये हमने अखबार में पढ़ा था तो इस लिस्ट में शामिल कर लिया. आमतौर पर कंपनियां माचिस के डब्बे में 50 तिलियां होने का दावा करती हैं. पर एक बच्ची ने जब माचिस की तिलियां गिनी, तो किसी में भी 50 तिलियां नहीं थी. तब बच्ची के पापा ने उपभोक्ता न्यायालय में शिकायत दर्ज की थी. कोर्ट के आदेश पर उस परिवार को मुआवज़ा भी दिया गया था.

    ये कुछ Cases हैं, जिनसे ये साफ़ पता चलता है कि अगर उपभोक्ता सजग हो, तो छोटी से छोटी ठगी से भी बचा जा सकता है. ‘जागो ग्राहक जागो’.

    Images are only for representative purposes.

  • in

    Snooze बटन दबाकर बार-बार सोने वालों! ये ख़बर पढ़कर एक ही बार में उठने की आदत डाल लोगे

    नींद जितनी ज़रूरी है, उसे उतना ही अनदेखा किया जाता है. विशेषज्ञों के अनुसार, 7-8 घंटे की नींद लेना ज़रूरी है, पर बहुत कम लोग ही ऐसा करते हैं. लोग 4 घंटे की नींद लेकर समझते हैं इससे उनका काम चल जाएगा.

    रिसर्च से पता चला है कि 6-7 घंटे से कम सोने वालों में आत्महत्या की प्रवृत्ति ज़्यादा होती है. इसके अलावा स्वास्थ्य से जुड़ी कई समस्याओं की भी आशंकाएं बढ़ जाती हैं. Alzheimer’s Disease, Anxiety, Depression आदि होने की संभावनाएं कई गुना ज़्यादा हो जाती है.

    Source: Imran Habib

    कुछ लोगों को नींद आती नहीं, वहीं कुछ लोगों की जाती नहीं. सुबह उठने में आलस करने वाले अकसर मोबाइल में अलार्म लगा तो लेते हैं, मगर उठते नहीं. एक रिसर्च से पता चला है कि अलार्म घड़ी से नींद टूटने पर आपके हृदय-गति कई गुणा ज़्यादा बढ़ जाती है. पर इस अलार्म से भी ज़्यादा हानिकारक है Snooze बटन. जी वही Snooze बटन, जिसके सहारे आलसी लोग 5 मिनट और कर-कर के सोते रहते हैं.

    Source: Zetizen

    Snooze करना, यानि कि 5,10,15 (Settings के अनुसार) मिनट बाद आपके अलार्म का फिर से बजना. यानि कि दिन में 3-4 बार आपके दिल की धड़कन का अचानक बढ़ जाना. अब इसे हफ़्ते, महीने और साल के हिसाब से सोचिये.

    आपके दिल पर पहले ही क्या कम परेशानियां हैं, जो उसे और परेशान कर रहे हैं? भलाई इसी में है कि एक बार में उठ जाइये. काम पर जाने के लिए लेट भी नहीं होंगे और आपका दिल भी सेफ़ रहेगा.

    Source: Daily Mail

    Feature Image Source: Huffington Post

  • in

    टैटू बनवाने से कमज़ोर हो सकती है Immunity. अब सोच लो, सेहत ज़रूरी है या Swag

    टैटू, कुछ लोगों के लिए Style Statement है, तो कुछ लोगों के लिए अपनी सोच को दिखाने का तरीका. कुछ जाति और जनजातियों की संस्कृति का हिस्सा है टैटू.

    लेकिन एक शोध से पता चला है कि Permanent टैटू से Lymph Nodes फ़ूल जाते हैं. Lymph Nodes, हमारे Immune System यानि शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता है. टैटू की इंक में ख़तरनाक केमिकल्स होते हैं, जो शरीर मं मौजूद Lymph Nodes तक पहुंचते हैं और उनका आकार बढ़ा देते हैं.

    Source: tuajesparamujeres

    शरीर में जाने वाले केमिकल्स के बारे में हमें कोई जानकारी नहीं होती. ज़्यादातर टैटू की स्याही में Organic Pigments होते हैं. इसी के साथ टैटू इंक को Preserve करने के लिए Preservatives और Nickel, Chromium, Manganese, Cobalt जैसे दूषित पदार्थ भी होते हैं.

    टैटू इंक में सबसे ज़्यादा कार्बन ब्लैक का इस्तेमाल किया जाता है. इसके अलावा टैटू इंक में Titanium Dioxide (एक सफ़ेद रंग का पदार्थ) का इस्तेमाल किया जाता है. Titanium Dioxide का इस्तेमाल Sunscreen और Paint में भी किया जाता है.

    सफ़ेद टैटू बनवाने पर खुजली, टैटू से बने जख़्म का ना भरना आदि कि समस्यायें होती हैं. ये Titanium Dioxide के ही साइड-इफ़ेक्ट्स हैं.

    Source: Rozali

    जर्मनी स्थित, European Synchroton Radiation Facility के शोधार्थियों ने शोध करके स्वास्थ्य पर टैटू से पड़ने वाले दुष्प्रभावों का पता लगाया है. रिसर्च के दौरान ही उन्हें इंसानों के शरीर के अंदर कई तरह के दूषित तत्व मिले. ये Nano Size के तत्व Lymph Nodes में भी मिले. शोधार्थियों के अनुसार, इन दूषित तत्वों के कारण ताउम्र Lymph Nodes का आकार बढ़ा हुआ ही रह जाता है.

    अब टैटू बनवाना या ना बनवाना तो आपका निर्णय है.

    Source: Mid Day

  • in

    देवी के स्वागत के लिए कोलकाता की सड़कों पर बनाई गई सबसे बड़ी रंगोली, शुरू हो गया 9 दिनों का पर्व

    या देवी सर्वभूतेषु शक्ति-रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्त्स्यै नमस्त्स्यै नमो नम:।

    दुर्गा पूजा, ये दो शब्द ही किसी भी बंगाली के दिलो-दिमाग़ में घर की याद दिलाने के लिए काफ़ी हैं और दुर्गा पूजा यानि कि कोलकाता.

    महालया के साथ ही शारदीय नवरात्र की शुरुआत हो गई. महालया के दिन पितृपक्ष की समाप्ति और देवीपक्ष की शुरुआत हो जाती है. दुर्गा पूजा सिर्फ़ एक पूजा नहीं है ये अपने आप में ही एक संस्कृति है. शास्त्रों के अनुसार, महालया के दिन ही देवताओं ने देवी दुर्गा से महिषासुर का अंत करने की प्रार्थना की थी. ये एक तरह का निमंत्रण है मां के लिए, कि वो कैलाश से अपनी संतानों को लेकर धरती पर आएं और बुरी शक्तियों से हमारी रक्षा करें.

    Source: Indian Express

    ऐसा भी कहा जाता है कि धरती पर आगमन के लिए, मां दुर्गा महालया के दिन ही कैलाश से प्रस्थान करती हैं.

    बंगालियों के लिए महालया का मतलब है, सुबह-सुबह उठना और बीरेंद्र कृष्णा भाद्र की आवाज़ में मंत्रों को सुनना. पहले ये रेडियो पर सुना जाता था और अब तो ऑनलाइन कहीं भी मिल जाता है. उनकी आवाज़ से ही एक अलग तरह की भावनाएं उमड़ती हैं, जिसे शब्दों में लिखना मुश्किल है.

    कोलकाता में महालया और दुर्गा पूजा के लिए बहुत बड़ी रंगोली (आलपोना) बनाई गयी. तस्वीरें किसी भी बंगाली को घर की याद दिलाने के लिए काफ़ी हैं.

    Source: Bong Feed
    Source: Scoop Whoop
    Source: Scoop Whoop

    Source: Scoop Whoopरंगोली को बनाने के लिए कुछ फ़िल्मों सितारों, प्रोसेंजित चैटर्जी, सब्यसाची चक्रवर्ती ने भी हिस्सा लिया.
    Source: India Blooms

    वीडियो देखकर वहां जाने का मन करेगा-

  • in

    दुनिया के वो अजीबोगरीब सिंड्रोम जब इंसान का अपने दिलो-दिमाग पर कोई काबू नहीं रह पाता है

    सिंड्रोम यानि किसी एक ख़ास परिस्थिति में एक ख़ास किस्म का व्यवहार करना, जो देखने और सुनने में व्यवहारिक न होकर एकदम अजीबोगरीब लगे. दुनिया में कई तरह के सिंड्रोम हैं और अगर आपको इन सिंड्रोम के बारे में जानकारी हो तो दुनिया के सबसे जटिल प्राणी यानि मनुष्यों के बारे में कुछ हद तक आपकी समझ भी बढ़ जाती है.

    1. स्टॉकहोम सिंड्रोम

    स्टॉकहोम सिंड्रोम इस लिस्ट में सबसे लोकप्रिय सिंड्रोम में शुमार है. माना जाता है कि आलिया भट्ट और रणदीप हुड्डा की फ़िल्म हाइवे भी इसी कॉन्सेप्ट पर आधारित थी.

    इस सिंड्रोम में लोगों को शारीरिक नुकसान से डर लगता है और ऐसे में कई बार लोग अपने अपहरणकर्ताओं के प्रति सहज होने लगते हैं, ताकि वो उन्हें नुकसान न पहुंचाने पाए. कई मामलों में ये सहजपन, दोस्ती और उसके बाद आकर्षण में बदल सकता है.

    स्टॉकहोम सिंड्रोम, 1973 में एक मामले के बाद चर्चा में आया था. 32 साल के एक क्रिमिनल एरिक ओल्सन ने बैंक में चोरी करते समय 4 लोगों का अपहरण किया था. छह दिन बाद जब ये पूरा मामला शांत हुआ तो चारों लोगों के अपने अपहरणकर्ता के साथ सकारात्मक रिश्ते बन चुके थे. इनमें से किसी ने भी एरिक के खिलाफ़ गवाही नहीं दी थी और इसके अलावा इन लोगों ने एरिक की सुरक्षा के लिए पैसों का इंतज़ाम भी शुरू किया था.

    2. लंदन सिंड्रोम

    लंदन सिंड्रोम को स्टॉकहोम सिंड्रोम का विपरीत कहा जा सकता है. इस सिंड्रोम में लोगों को अपने अपहरणकर्ता के लिए बेहद नफ़रत फ़ील होने लगती है.

    1980 में लंदन में ईरान एंबेसी की घेराबंदी के दौरान अब्बास लावासानी नाम के एक शख़्स ने अपने अपहरणकर्ताओं के साथ बहस करनी शुरू कर दी थी. उसके विरोध का आलम ये था कि अपहरणकर्ताओं ने उसे मार गिराया था.

    3. Uppgivenhetssyndrom

    हालांकि इस डिसऑर्डर का नाम किसी जगह पर नहीं पड़ा है, लेकिन ये डिसऑर्डर केवल एक ही जगह पर होता है. स्वीडन से माइग्रेट हुए कई बच्चों और नौजवानों को पूर्वी सोवियत या युगोस्लोवाकिया जैसे देशों में शरण लेनी पड़ती है. इस पीड़ादायक माइग्रेशन के बाद ये लोग अपने देश से बाहर निकलने पर इतने दुखी होते हैं कि खाना पीना, बोलना सब भूल जाते हैं और डिप्रेशन का शिकार भी हो सकते हैं. खास बात ये है कि स्वीडन से माइग्रेट होकर दूसरे देशों में जाने वाले लोगों में ही ये सिंड्रोम देखा गया है.

    4 पेरिस सिंड्रोम

    हर साल साठ लाख जापानी पर्यटक पेरिस की यात्रा करते हैं. पेरिस को प्यार का शहर कहा जाता है. इस शहर के ग्लैमर, हाई फ़ैशन लाइफस्टाइल और दुनिया के सर्वाधिक रोमांटिक शहर की छवि गढ़ी गई है. यही कारण है कि कई जापानी लोग इस शहर में कुछ अनोखी धारणाओं के साथ पहुंचते हैं लेकिन जब वास्तविकता से इन लोगों का सामना होता है, तो कई लोगों को कल्चर शॉक लगता है और ऐसे में कई लोगों को बैचेनी और मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ता है. ज़्यादातर लोगों के लिए इस परिस्थिति में पेरिस छोड़कर वापस अपने देश जापान चले जाना ही उचित उपाय माना जाता है.

    5. फ़्लोरेंस सिंड्रोम

    अगर आप किसी आर्ट म्यूज़ियम में हैं और आपको बैचेनी, पसीना आना और अजीब महसूस होने लगता है, तो बहुत ज़्यादा सम्भावना है कि आप फ़्लोरेंस सिंड्रोम से गुज़र रहे हो.

    लेकिन ऐसा क्यों होता है? क्या सदियों पुरानी तस्वीरें या आर्टिस्टिक पेटिंग्स की गंध दिमाग में चढ़ जाती है? नहीं ऐसा नहीं है. दरअसल इस परिस्थिति को आर्ट का ओवरडोज़ होना भी कहा जा सकता है. ज़्यादातर केसों में ऐसे लोग अक्सर किसी भी नई चीज़ के आगमन से जल्दी ही प्रभावित हो जाते हैं, इन स्थितियों में लोगों की उम्र अक्सर 26 से 40 की उम्र तक होती है. यात्रा से थकान और आर्ट का ओवरडोज़ लोगों को ऐसा महसूस करा सकता है.

    6. जेरूसेलम सिंड्रोम

    क्या किसी धार्मिक जगह पर जाने के बाद लोगों के विचारों और व्यवहार में बदलाव आ सकता है? जेरूसेलम सिंड्रोम दरअसल एक ऐसा ही सिंड्रोंम है. कई पर्यटक इस जगह जाने के बाद ये दावा कर चुके हैं कि वो बाइबिल के कोई पात्र है और वे अपने आपको अलौकिक शक्तियों से घिरा मानने लगते हैं.

    हालांकि जेरूसेलम सिंड्रोम कई मायनों में पेरिस सिंड्रोम की तरह भी हो सकता है क्योंकि कई लोगों के लिए अक्सर जेरूसेलम कल्चर शॉक साबित होता है. जेरूसेलम सिंड्रोम के शिकार लोगों को बैचेनी हो सकती है. लोगों से मिलने की जगह, अकेलापन ज़्यादा रास आ सकता है. किसी धार्मिक जगह में अत्यधिक दिलचस्पी जैसी कई चीज़ें जेरूसेलम सिंड्रोम का हिस्सा होती हैं.

    7. जंपिंग फ्रेंचमैन ऑफ़ Maine

    1870 में उत्तरी Maine में फ़्रेंच और कनाडा के लोग जब किसी बात पर भौंचक्के होते थे तो कूदने लगते थे और अपने आसपास मौजूद लोगों की नकल उतारने लगते थे. इसके अलावा ये लोग चिल्लाना, कूदना, एक-दूसरे को मारना और कई अजीबोगरीब चीज़ें भी करते थे. हालांकि ये सिंड्रोम Maine के साथ ही गायब हो गया, लेकिन इसी तरह के बिहेवियर को लुईसियाना, मलेशिया, साइबेरिया, भारत, सोमालिया और यमन के कुछ क्षेत्रों में भी देखा गया था. कुछ लोगों का मानना है कि ये डिसऑर्डर, कहीं न कहीं जेनेटिक भी हो सकता है.

    8. लिमा सिंड्रोम

    लिमा सिंड्रोम, स्टॉकहोम सिंड्रोम से एकदम विपरीत है. इस सिंड्रोम में अपहरणकर्ता अपने द्वारा कैद किए गए शख़्स के लिए सहानुभूति महसूस करने लगता है.

    इस शब्द का पहली बार इस्तेमाल 1996 में हुआ था, जब पेरू में मिलिटेंट मूवमेंट के लोगों ने कुछ ही दिनों में ज़्यादातर अपहरण किए लोगों को छोड़ दिया गया, इनमें वे लोग भी शामिल थे, जिन्हें अपहरण के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा था.

    Source: oddee

  • in

    उसे उस अजनबी से प्यार हो गया था, पर वो अजनबी किताब से नज़र ही नहीं उठाता था. अलग है ये Love Story

    इश्क़ भी न जाने किस-किस तरह से हमारी ज़िन्दगी में आता है. आजकल के हालात कुछ यूं हो चले हैं कि पहली नज़र के प्यार पर भरोसा करना ज़रा मुश्किल हो गया है. पर कुछ ऐसी कहानियां हमसे रूबरू होती हैं, जिनसे ये साबित हो जाता है कि दुनिया में मोहब्बत अब भी बाकी है और वक़्त-बेवक़्त लोगों की ज़िन्दगी में दस्तक भी देती हैं.

    Zoe Folbigg की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. Zoe ट्रेन से सफ़र करती थी और उनके साथ इत्तफ़ाक से हर रोज़ एक अजनबी भी सफ़र करता था.

    ये अजनबी दूसरे सहयात्रियों से काफ़ी अलग था. हमेशा एक किताब में आंखें गड़ाए बैठा रहता. एक पल के लिए भी सिर नहीं उठाता.

    Source: Epoch Times

    Zoe उस अजनबी को पसंद करने लगी. Jeans और Converse Shoes पहनने वाली Zoe. उस अजनबी का ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए अच्छे से Dress-Up करने लगी. पर वो अजनबी अपने किताब में ही डूबा रहता.

    हर रोज़ एक ही Compartment में सफ़र करते, पर कभी कोई बात नहीं. Zoe बात करना चाहती, लेकिन अजनबी कभी भी किताब से नज़र ही नहीं हटाता था. आलम ये था कि Zoe के इस Train वाले Crush के बारे में उसके दोस्तों को भी पता चल गया. सबने उस अजनबी का नाम ‘Train Man’ रख दिया.

    ये पहली नज़र का प्यार था. ये सुनने में अजीब है पर मैंने वैसा ही महसूस किया, Zoe ने बताया.

    Source: Epoch Times

    Zoe के Co-workers उससे Train Man के बारे में पूछते. ‘आज उसने क्या पहना था?’, ‘क्या उसने तुम्हारी तरफ़ देखा’. इस आखरी सवाल का जवाब हमेशा ना होता.

    Zoe, Train Man से बात करना चाहती थी और एक Co-worker ने उन्हें बातचीत शुरू करने का उपाय भी बता दिया. Zoe ने उस अजनबी के सामने अपनी Train Ticket गिरा दी, इश उम्मीद में कि वो इसी बहाने उससे बात कर लेगी. 1 घंटे तक अजनबी ने ध्यान ही नहीं दिया. 1 घंटे बाद Train Man ने टिकट उठाकर Zoe को दिया, पर वो ‘Thankyou’ के अलावा कुछ नहीं कह पाई.

    Source: Daily Mail

    Zoe ने बताया,

    ‘ऐसा नहीं कि मैंने उस साल किसी के साथ Date पर नहीं गई. पर मुझे किसी से वो Connection महसूस ही नहीं होता जैसा उस अजनबी से होने लगा था.’

    बहुत हिम्मत करके अपने Birthday पर Zoe ने उस अजनबी को एक Love Letter देने की सोची. Zoe ने चिट्ठी उस अजनबी को दी और उसके Reaction को देखे बिना ही वहां से चली गई.

    चिट्ठी में Zoe ने अपने बारे में बताया और उस Train Man से Drinks के लिए चलने को कहा और साथ ही अपना E-mail भी दे दिया. ये भी लिख दिया कि अगर वो Intrested नहीं है तो Zoe उसे दोबारा परेशान नहीं करेगी.

    Source: Daily Mail

    एक दिन उसके पास एक Mail आया जिसका Subject Line था ‘The Guy On The Train’. Zoe की धड़कनें रुक गई. उसने Mark(Train Man) का Mail खोला,

    ‘शुक्रिया, जो आपने किया उसके लिए. मेरे पास ऐसा कुछ करने की हिम्मत कभी नहीं कर पाता. पर मेरी एक Girlfriend है और अगर मैं आपके साथ बाहर गया तो उसे अच्छा नहीं लगेगा. Happy Birthday. उम्मीद करता हूं आपका दिन अच्छा बीतेगा.’

    Zoe को लगा कि ये इस कहानी का अंत था. इस घटना के बाद Zoe और Mark फिर से अजनबी गये. ट्रेन में सफ़र का सिलसिला भी जारी रहा.

    Source: India.com

    8 महीनों बाद, Zoe को Mark का दूसरा Mail मिला. Mark 8 महीनों से Single था और इस दौरान वो Zoe के बारे में ही सोचता रहा. Mark ने Zoe को Date पर चलने के लिए पूछा था.

    Source: The Sun

    पहली मुलाक़ात में ही न कोई संकोच था और न ही कोई दुविधा. दोनों के पास ही बातें करने के लिए बहुत से Topics थे. पहली Date के बाद दोनों ही दोबारा मिलने के लिए बेचैन हो गए. पहली Date के 3 महीने बाद ही दोनों साथ रहने लगे.

    3 साल बाद दोनों Vacation पर ऑस्ट्रेलिया जा रहे थे. ट्रेन में सफ़र के दौरान ही Mark ने Zoe को शादी के लिए Propose किया.

    Source: The Sun

    आज दोनों के दो बच्चे हैं और Zoe अपने इस प्यारी सी Love Story पर किताब लिख चुकी हैं.

    रोज़ भाग-भाग कर मेट्रो, बस, लोकल पकड़ते हो. रुककर 1 पल सोचते भी नहीं. देखते भी नहीं कि आस-पास कौन है. कौन है जो तुम्हारे साथ रोज़ सफ़र करता है और तुम जानते भी नहीं कि वो तुम्हारा हमसफ़र बन चुका है. ध्यान दीजियेगा, क्या पता कब कहां कोई अजनबी आपका हमसफ़र बन जाए?

    Source: Epoch Times

Load More
Congratulations. You've reached the end of the internet.