महाभारत का अत्यंत घनघोर युद्ध चल रहा था। लड़ते लडते अर्जुन कब दूर निकल गए उन्हें पता ही नहीं चला। अर्जुन के न होने का फायदा द्रोणाचार्य ने उठाया। उन्होंने चक्रव्यूह की रचना की ताकि पांडव हार जाये। अर्जुन का पुत्र अभिमन्यु चक्रव्यूह भेदने की कोशिश में उसमे प्रवेश कर गया।


युद्ध कलाओं में निपुण अभिमन्यु ने चक्रव्यूह के साथ चरण सफलतापूर्वक भेद दिए लेकिन सातवे चरण में प्रवेश करते ही उसे दुर्योधन,जयद्रथ आदि सात महारथियों ने उसे घेर लिया और उसपर टूट पड़े। जयद्रथ ने कायरतापूर्वक निहथ्हे अभिमन्यु पर पीछे कीओर से जोरदार प्रहार किया। अचानक हुए इस तेज प्रहार को अभिमन्यु सहन नहीं कर सका और वीरगति को प्राप्त हो गया।


जब यह बात अर्जुन को पता चली तो वो गुस्से से पागल हो उठा। उसने अगले सूर्यास्त से पहले जयद्रथ को मरने की प्रतिज्ञा ले ली और अगर वो ऐसा नहीं कर पायेगा तो आत्मदाहकर लेगा। जयद्रथ भयभीत होकर दुर्योधन के पास पहुंचा। दुर्योधन ने उसे सांत्वना दिया की सारी कौरव सेना उसकी रक्षा करेगी और अर्जुन को आत्मदाह करना पड़ेगा।

अगले दिन युद्ध प्रारम्भ हुआ। जयद्रथ सारी कौरव सेना के पीछे छिपा था।अर्जुन ने कृष्णा से कहा ऐसे तो मै पूरा लड़ता रहूंगा पर जयद्रथ मुझे नही मिलेगा । कृष्णा ने अर्जुन का उत्साह बढ़ाया और कहा तुम अपना कर्म करो वत्स । अर्जुन कौरव सेना से लड़ने लगा। उनकी आँखे जयद्रथ को ढूंढ रही थी।
युद्ध करते करते शाम होने को आ गया लेकिन जयद्रथ का कहीं अता पता नहीं था। अर्जुन ने भगवन कृष्ण की और देखा और निराश हो गया। कृष्णा ने कहा चिंता मत करो पुत्र मैं कुछ करता हूँ।


यह कहकर कृष्ण ने माया फैला दी और सूर्य बदलो से घिर गया। सबको लगा शाम हो गयी। जयद्रथ सामने आकर अर्जुन पर जोड़ जोड़ से हसने लगा तथा उसके आत्मदाह की प्रतीक्षा करने लगा।

कृष्णा ने अर्जुन से कहा वत्स तुम्हारा लक्ष्य तुम्हारे सामने खड़ा है उठाओ अपना गांडीव और वध कर दो इसका। ऐसा कहकर उन्होंने माया हटा दी। सूर्य बदलो से निकल फिर चमकने लगा। यह देख दुर्योधन और जयद्रथ चौंक गए। जयद्रथ भागने लगा लेकिन अर्जुन का गांडीव तैयार था। अर्जुन ने जयद्रथ का वध किया और इस तरह उसकी प्रतिज्ञा पूरी हुई।


सच ही है भगवन की लीला अपरमपार है।

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