Monday, September 21, 2020
Home Asli Story मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान !

मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान !

आप सब कबीर को तो जानते ही होंगे । मैं भी कैसा सवाल पुछ रहा हूँ । उनको कौन नही जानता खासकर उस देश मे जहा हम बचपन से हिंदी विषय मे उनके दोहे पढ़ते हुए आ रहे हो । उन्ही का एक प्रसिद्ध दोहा है –

जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान,

मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।

कबीर इसके माध्यम से कहते है कि साधु की जाती मायने नही रखती उनका ज्ञान मायने रखता है , ठीक उसी तरह तलवार का म्यान कैसा है उससे कोई प्रभाव नही पड़ता , म्यान के अंदर तलवार कैसी है ये ज्यादा मायने रखता है ।

कबीर का ये दोहा हमारे देश मे फैले जातिवाद की तरफ इशारा करती है । हमारे यहां पंडित का बेटा पंडित बनता है और कुम्हार का बेटा कुम्हार बनता है । जबकि किसी की जाति उसका कर्म निर्धारित करती है । कुम्हार का बेटा भी अगर पंडितो वाले कर्म करे तो उसे भी पंडित कहा जाना चाहिए और उसी तरह अगर पंडित कुम्हार वाले कर्म करे तो उसे कुम्हार कहा जाना चाहिए । अतः कबीर कहते है साधु का ज्ञान देखना चाहिए उसकी जाती नही ।

ते दिन गए अकारथ ही, संगत भई न संग ।
प्रेम बिना पशु जीवन, भक्ति बिना भगवंत
।।

कबीर कहते है अगर जीवन मे हमने सज्जनों की मित्रता नही की , तो हमारा जीवन व्यर्थ है । और जिसके पास दयाभाव की कमी है वह जीवन पशु समान है । कहते है सज्जनों की मित्रता तथा दयाभाव से हमारे मन मे ईश्वर का वास होता है । मित्र अगर सज्जन हो तो वो हमें कुमार्ग से निकाल सन्मार्ग पर चलने को प्रेरित करते है ।

चिंता ऐसी डाकिनी, काट कलेजा खाए।
वैद बिचारा क्या करे, कहां तक दवा लगाए

कबीर कहते चिंता उस डाकू के समान है जो हमारे सुख चैन को लूट ले जाती है , हमारे कलेजे को खा जाती है । और इस बीमारी का इलाज कोई वैद्य के बस की बात नही । चिंता को चिता के समान कहा जाता है जो हमे भीतर ही भीतर जला के राख कर देता है ।

माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर।
आशा, तृष्णा ना मरी, कह गए दास कबीर

कबीर कहते है इस शरीर का अंत हो जाता है लेकिन मानवीय इक्षाओं का अंत कभी नही होता । हम चाह कर भी उम्मीद करना नही छोर सकते ।हमारे दिल में हमेशा किसी न किसी चीज की इक्षा बनी ही रहती है । किसी को धन की ख्वाहिश होती है , तो किसी को किसी व्यक्ति की चाहत होती है , वही किसी को प्रेम की चाहत होती है पर होती जरूर है ।

जग में बैरी कोई नहीं, जो मन शीतल होय

यह आपा तो डाल दे, दया करे सब कोय

कबीर के अनुसार अगर हमारे मन मे शीतलता है , तो इस संसार मे हमारा कोई दुश्मन नही बन सकता । अगर हम अपने अहंकार का त्याग कर दे तो शत्रु भी हम पर दया करने को तैयार हो जाता है । अतः विकट परिस्थितियों में भी अपने मन की शीतलता को बनाये रखना चाहिए ।

उम्मीद है ये पोस्ट आपके जिंदगी में ब्रह्मास्त्र साबित होगी । ऐसे ही पोस्ट के लिए ब्रह्मास्त्र से जुड़े ओर औरो को भी जोड़े । क्योंकि बदलाव की शूरुआत हमसे और आपसे ही होती है ।

आपका दिन शुभ हो !

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

समस्याएं – सौ ऊंटो की कहानी

जीवन में कभी कभी हम चारो ओर से समस्याओं से घिर जाते हैं और फिर सोचते है ये हमारे साथ ऐसा क्यों...

सबसे कीमती चीज !

इस दुनिया मे सबसे कीमती चीज क्या है ? कुछ लोगो के अनुसार धन सबसे कीमती है तो कुछ लोगो के लिए...

हनुमान जी का जन्म और नामाकरण

'हनुमान' यह शब्द हिन्दू धर्म मे एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है । इन्हें हिन्दू धर्म मे संकटमोचन के उपाधि से नवाजा...

शिष्टाचार – स्वामी विवेकानंद का प्रसंग

जब भी भारत के पवित्रता तथा अथाह ज्ञान से भरे इतिहास की बात की बात होती है तो विवेकानंद जी का नाम...

Recent Comments